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कन्वर्जन करने पर अनुसूचित जाति के दर्जे का समाप्ति

प्रस्तावना

सामाजिक न्याय से जजुडा कई बार  एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है — क्या धर्म परिवर्तन के बाद भी कोई व्यक्ति SC/ST दर्जे का लाभ प्राप्त कर सकता है?

24 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रश्न पर बिल्कुल स्पष्टता के साथ एक निर्णायक और ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

 सुप्रीम कोर्ट का 2026 का फैसला

  • वर्ष 2021 गुंटूर जिला| Chinthada Anand, जो एक दशक से अधिक समय से ईसाई पादरी के रूप में सेवारत थे, ने SC/ST अधिनियम के तहत Akkala Rami Reddy पर मामला दर्ज कराया।
  • पुलिस ने प्रारंभ में chargesheet दाखिल की, लेकिन Reddy ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में इस आधार पर FIR को चुनौती दी कि Anand का पादरी के रूप में कार्य करना उनके धर्मांतरण का स्पष्ट प्रमाण है, और इसलिए उनका SC दर्जा समाप्त हो चुका है।
  • मई 2025 में हाईकोर्ट के जस्टिस एन. हरिनाथ ने A.R.R. के पक्ष मे निर्णय देते हुए SC/ST Act के तहत कार्यवाही रद्द कर दी।
  • 24 मार्च 2026 कोसुप्रीम कोर्ट की पीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि ईसाई धर्म में परिवर्तन से अनुसूचित जाति जा दर्जा (SC Status) का तत्काल समाप्त हो जाता है|
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि Constitution (Scheduled Castes) Order, 1950 की Clause 3 के तहत केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म मानने वाले ही SC सदस्य हो सकते हैं, और ईसाई धर्म में परिवर्तन से यह दर्जा तत्काल समाप्त हो जाता है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि जन्म के आधार पर SC दर्जा धर्म परिवर्तन के बावजूद बना रहता है।
  • यह भी सर्व सामान्य माना जाता है कि ऐसे धर्मांतरण अक्सर “लालच” और भौतिक प्रलोभनों से प्रेरित होते है।

1950 — नींव रखी गई:

  • जब Constitution (Scheduled Castes) Order, 1950 लागू हुआ, तो SC दर्जा केवल हिंदुओं तक सीमित था। बाद में 1956 में सिख समुदाय को और 1990 में बौद्ध समुदाय को इसमें शामिल किया गया — क्योंकि ये धर्म भी हिंदू धर्म के अंतर्गत आने वाली जाति व्यवस्था से प्रभावित रहे थे। परंतु ईसाई और इस्लाम को इस दायरे से बाहर रखा गया, क्योंकि इन धर्मों में जाति-आधारित व्यवस्था नहीं है।

The Constitution (Scheduled Castes) Order, 1950 — प्रावधान  

  • 1950 के संवैधानिक आदेश का Paragraph 3 कहता है: “कोई भी व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा कोई अन्य धर्म मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।” सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह रोक पूर्ण है और इसमें किसी अपवाद की कोई गुंजाइश नहीं है।

अन्य संदर्भ:

संदर्भ मामला 1: Soosai v. Union of India (1985/1986)

  • Soosai आदि-द्रविड़ SC समुदाय से थे और ईसाई धर्म में परिवर्तित हो चुके थे। वे मद्रास में सड़क किनारे मोची का काम करते थे। तमिलनाडु सरकार के एक G.O. के तहत SC कोबलरों को मुफ्त दुकानें आवंटित की जानी थीं, परंतु ईसाई होने के कारण Soosai को इससे वंचित किया गया।
  • पेटिशनर ने तर्क दिया कि 1950 का संवैधानिक आदेश अनुच्छेद 14, 15 और 25 का उल्लंघन करता है। न्यायालय ने कहा कि यह स्थापित है कि जाति व्यवस्था हिंदू सामाजिक संरचना की विशेषता है और हिंदू समाज की एक सामाजिक घटना है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ईसाई धर्म में परिवर्तन के बाद कोई व्यक्ति SC दर्जे का दावा नहीं कर सकता, क्योंकि धर्मांतरण से व्यक्ति की सामाजिक स्थिति में मूलभूत परिवर्तन होता है।
  • महत्व: Dalit Christians को SC दर्जे से पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने सीधे इनकार किया। 1950 का Order संवैधानिक घोषित हुआ।

संदर्भ मामला 2: Kailash Sonkar v. Smt. Maya Devi (1983/1984)

  • Maya Devi का जन्म ईसाई परिवार में हुआ। उन्होंने हिंदू धर्म वापस अपनाया, शुद्धिकरण संस्कार किया और हिंदू व्यक्ति से विवाह किया। फिर SC-आरक्षित उत्तर प्रदेश विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीता।
  • Kailash Sonkar ने उनके SC दर्जे को न्यायालय में चुनौती दी — तर्क दिया कि ईसाई धर्म में जन्म से उनकी जाति पहचान समाप्त हो चुकी थी।
  • सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू धर्म में वापस आता है और उसका समुदाय उसे स्वीकार करता है तो SC दर्जा बहाल हो सकता है।
  • घर वापसी पर SC दर्ज पुन: प्राप्त हो जाता है।

संदर्भ मामला 3: C. Selvarani v. Special Secretary-cum-District Collector (2024)

  • नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने C. Selvarani के SC आरक्षण दावे को “संविधान के साथ धोखाधड़ी” करार देते हुए खारिज किया। Selvarani ने पुडुचेरी में Upper Division Clerk पद के लिए आवेदन में खुद को हिंदू Valluvan (SC) बताया, जबकि वे बपतिस्मा प्राप्त ईसाई थीं।
  • न्यायालय ने कहा: “जो व्यक्ति ईसाई है लेकिन केवल नौकरी में आरक्षण पाने के लिए हिंदू होने का दावा करता है — उसे SC दर्जा देना आरक्षण के उद्देश्य के विरुद्ध है और संविधान के साथ धोखाधड़ी है।”
  • न्यायालय ने यह भी कहा कि वास्तविक विश्वास के बिना केवल आरक्षण लाभ पाने के लिए धर्म परिवर्तन — या धर्म वापसी का दावा — आरक्षण नीति के सामाजिक उद्देश्यों को कमजोर करता है।
  • महत्व: “Dual Identity” — ईसाई रहते हुए हिंदू होने का दावा — पूरी तरह अस्वीकार्य घोषित हुई। यह 2026 के फैसले में भी directly cite किया गया।

संदर्भ मामला 4: Jitendra Sahani v. State of U.P. — Allahabad High Court (2025)

Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट | Date: नवंबर 2025

  • यह मामला तब सामने आया जब अदालत ने महसूस किया कि एक पुलिस गवाह ने कहा था कि Sahani मूलतः हिंदू-केवट समुदाय से थे, लेकिन “ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके थे और पादरी (Padri) का पद संभाल रहे थे।” Sahani के शपथपत्र में उनका धर्म हिंदू लिखा था।
  • जस्टिस गिरी ने Constitution (Scheduled Castes) Order, 1950 का Paragraph 3 उद्धृत करते हुए Sahani की याचिका खारिज की — और कहा कि ऐसे अनेक पूर्व निर्णय हैं जो दिखाते हैं कि ईसाई धर्म में परिवर्तित व्यक्ति SC लाभ का दावा नहीं कर सकता।
  • इसके बाद न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को चार महीने में यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि जिन लोगों ने अल्पसंख्यक धर्म अपनाया है वे SC लाभ न लें।

संदर्भ मामला 5: V. Amutha Rani — Madras High Court, Madurai Bench (मई 2025)

  • जस्टिस विक्टोरिया गौरी ने AIADMK पदाधिकारी V. Amutha Rani को Theroor Town Panchayat के अध्यक्ष पद से अयोग्य घोषित किया — जो पद SC (सामान्य) के लिए आरक्षित था। याचिका DMK सदस्य V. Iyyappan ने दायर की थी।
  • Rani मूलतः हिंदू Pallar SC समुदाय से थीं, परंतु 2005 में Indian Christian Marriage Act के तहत एक ईसाई व्यक्ति से विवाह कर ईसाई बन गई थीं।
  • मई 2025 में मद्रास हाईकोर्ट ने दोहराया कि हिंदू, सिख या बौद्ध के अलावा किसी अन्य धर्म में परिवर्तित व्यक्ति SC लाभ का दावा नहीं कर सकता। न्यायालय ने कड़े शब्दों में कहा कि धर्मांतरण के बाद SC दर्जे का दावा करना “संविधान के साथ धोखाधड़ी” है।

निष्कर्ष

  • 2026 का यह फैसला कोई नया कानून नहीं है, बल्कि यह 1950 के मौजूदा संवैधानिक ढाँचे की पुनः पुष्टि है। इस निर्णय ने रेखांकित किया कि भारत में SC दर्जे की कानूनी मान्यता एक धर्म-संबद्ध ढाँचे द्वारा नियंत्रित होती है, और इस स्थिति में कोई भी बदलाव न्यायिक विस्तार से नहीं बल्कि संसदीय कार्रवाई से ही आना होगा।
  • उपरोक्त सभी पाँचों मामले — Soosai (1986), Kailash Sonkar (1984), C. Selvarani (2024), Jitendra Sahani (2025), V. Amutha Rani (2025) — एक सुसंगत न्यायिक परंपरा की कड़ियाँ हैं जो 76 वर्षों से एक ही सिद्धांत को दोहराती आई हैं।
  • न्यायपालिका ने Dalit Christians और Muslims की ऐसी माँगों को हर बार अतार्किक और असंवैधानिक मानते हुए अस्वीकार किया है।

SC दर्जा एक संवैधानिक विशेषाधिकार है जो ऐतिहासिक जाति-आधारित से पीड़ित वर्ग विशेष के लिए बना था — इसे उन लोगों तक सीमित रखना जो उस सामाजिक संरचना में हैं जिसके लिए इसे बनाया गया था, संविधान की मूल भावना के अनुरूप है।

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