समाज एवं संस्कृति अध्ययन केंद्र राजस्थान

भारतीय स्त्री चिंतन: समकालीन धारणा और भविष्य की दिशा

भारतीय स्त्री चिंतन: समकालीन धारणा और भविष्य की दिशा

दिनांक: 10-03-2026            

स्थान: श्री अग्रसेन स्नातकोत्तर शिक्षा महा विद्यालय, केशव विद्यापीठ, जामडोली, जयपुर 

समाज एवं संस्कृति अध्ययन केन्द्र, राजस्थान एवं श्री अग्रसेन स्नातकोत्तर शिक्षा महाविद्यालय केशव विद्यापीठ जामडोली जयपुर के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय स्त्री चिंतन: समकालीन धारणा और भविष्य की दिशा” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय समाज में स्त्री की भूमिका, सांस्कृतिक दृष्टिकोण तथा समकालीन चुनौतियों पर वैचारिक मंथन करना था। राजस्थान के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थियों द्वारा 27 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।

प्रथम सत्र:

विश्व संवाद केंद्र, जयपुर की निदेशक डॉ. शुचि चौहान ने संगोष्ठी के आयोजन का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कार्यक्रम की प्रस्तावना रखी।

मुख्य अतिथि राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष ने अपने उद्बोधन में कहा कि संसार के दो प्रमुख मजहब, ईसाईयत और इस्लाम के अनुसार स्त्री का निर्माण पुरुष के बाद, पुरुष के द्वारा और पुरुष के भोग के लिए ही हुआ है जबकि हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार विराट पुरुष ने स्वयं को दो भागों मे विभाजित कर अर्धभाग से पुरुष और अर्धभाग से नारी की रचना की। यह स्त्री-पुरुष की समानता को पोषित करने वाला सिद्धांत है। वेदों मे स्त्री को पुरुष के समतुल्य सम्मान सूचक शब्दों से संबोधित किया गया है। ऋग्वेद मे पुरुष को सम्राट, राजा, मनीषी और सभासद कहा है, तो स्त्री को भी साम्राज्ञी, राज्ञी, मनीषा, सभासदा कहा है।

उन्होंने कहा की स्त्रियों की स्थिति वैदिक एवं महाभारत काल मे अत्यंत श्रेष्ठ थी लेकिन बौद्ध काल के उपरांत समाज मे पतन प्रारंभ होता गया जो भारत मे इस्लामी शासकों के आने के बाद अत्यंत शोचनीय दशा मे आ गया। स्त्रियों की परतंत्रता और उन पर पुरुषों का नियंत्रण भी इसी क्रम मे बढ़ते गए। यह परिवर्तन इस्लामी अत्याचारों के निवारणार्थ तो हुआ ही था, कुछ प्रभाव भारत मे आने वाले विदेशियों की मजहबी धारणाओ की देखादेखी भी हुआ जो भारत मे अपने पैर पसार चुके थे ।  

भारतीय संस्कृति मे स्त्री को ‘शक्ति’ का रूप माना गया है। स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक है, दोनों एक समान महत्वपूर्ण है। स्त्री परिवार की आधारशिला होती है जो प्रेम, त्याग और संस्कारों से पूरे परिवार को जोड़कर रखती है। भारतीय परंपरा में स्त्री को केवल घर तक सीमित नहीं माना गया, बल्कि उसे समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है।

समाज एवं संस्कृति अध्ययन केन्द्र, राजस्थान के संयोजक डॉ. अमित झालानी ने केन्द्र का परिचय देते हुए कहा कि आज के समय भारतीय नारी चिंतन पश्चिम के नारीवाद से प्रभावित है जिसने नारी और पुरुष को एक दूसरे के विरोध में खड़ा कर दिया है। जबकि वास्तव में भारतीय दृष्टि में स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने कहा कि भारत के विचार को भारत की दृष्टि से समझने की आवश्यकता है और भारत के विचार के अध्ययन के लिए ही केंद्र कार्यरत है। प्रो. रीटा शर्मा ने वर्तमान समाज मे स्त्रियों की आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों मे बढ़ती भूमिका पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर उप-प्राचार्य डॉ. सतीश चन्द मंगल तथा शोध विभाग की प्रभारी एवं संगोष्ठी समन्वय डॉ. रेणु शर्मा भी मंच पर उपस्थित रहे।

द्वितीय सत्र

द्वितीय सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में स्तंभकार बिरेंद्र पाण्डेय, सुश्री नीलू शेखावत एवं डॉ. शकुन्तला खत्री रहे। सुश्री नीलू शेखावत ने लोकगीतों में महिला विषय पर बोलते हुए कहा कि गणगौर उत्सव महिलाओं के बीच संवाद और जुड़ाव का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि जब कोई नई महिला परिवार में प्रवेश करती है, तो मंगल गीत गए जाते हैं। ऐसे अवसर उसे सहज रूप से पूरे परिवार से स्नेह पूर्ण संबंध बनाने में सहायक होते हैं। पारंपरिक गीतों के माध्यम से नई महिला परिवार के विभिन्न रिश्तों को समझती है और उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ती है जिससे परिवार के सदस्यों के बीच अपनत्व और आपसी संबंधों की भावना सुदृढ़ होती है।

डॉ. बिरेंद्र पाण्डेय ने अपने वक्तव्य में भारतीय दृष्टि मे नारी चिंतन पुस्तक का परिचय देते हुए बताया कि भारतीय परंपरा में नारी को केवल परिवार की सामान्य सदस्य के रूप में ही नहीं, बल्कि संस्कृति, मूल्यों और सामाजिक संतुलन की वाहक के रूप में देखा गया है। उससे में नारी को शक्ति, सृजन और संवर्धन का प्रतीक माना गया है, जो परिवार और समाज दोनों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।