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जीण माता मेला

जीण माता मेला

परिचय:

जीण माता मंदिर राजस्थान के सीकर जिले से लगभग 30 किमी दक्षिण में रेवासा गांव के पास ओरान पर्वत अरावली पहाड़ी में स्थित एक प्राचीन और अत्यंत प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। मंदिर का निर्माण लगभग 1100 वर्ष पुराना माना जाता है। यहाँ वर्ष में दो बार विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसे जीण माता मेला कहा जाता है। यह मेला राजस्थान के सबसे बड़े धार्मिक मेलों में से एक है। जीण माता को चौहान राजपूत समाज और मीणा समाज में कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है।

मंदिर का इतिहास

मंदिर में अलग-अलग आठ शिलालेख लगे है, जो मंदिर की प्राचीनता के सबल प्रमाण है।

  1. संवत 1029 (ईस्वी सं 972) यह महाराजा खेमराज की मृत्यु का प्रमाण है। मतलब मंदिर उससे भी प्राचीन है।
  2. संवत 1132 जिसमे मोहिल के पुत्र हन्ड द्वारा मंदिर निर्माण का उल्लेख है।
  3. संवत् 1162 विक्रम वर्ष 1162 का एक शिलालेख (1105 ई.), शेखावाटी में जीणमाता मंदिर सभामंदप की एक स्तंभ पर उत्कीर्ण है, कॉल मैं प्रिथ्विराजा परमभात्तारका महाराजधिराजा – परमेश्वर, जिससे उसकी महान् शक्ति का एक शासक के रूप में स्वतंत्र स्थिति दिखा।
  4. संवत 1196 महाराजा आर्णोराज के समय के दो शिलालेख।
  5. संवत 1230 इसमें उदयराज के पुत्र अल्हण द्वारा सभा मंडप बनाने का उल्लेख है।
  6. संवत 1382 जिसमे ठाकुर देयती के पुत्र श्री विच्छा द्वारा मंदिर के जीर्णोद्दार का उल्लेख है।
  7. संवत 1520 में ठाकुर ईसरदास का उल्लेख है।
  8. संवत 1535 को मंदिर के जीर्णोद्दार का उल्लेख है।

जीण माता का वास्तविक नाम जयन्तीबाई था। इनके भाई का नाम हर्षनाथ था, जिनके नाम पर सीकर में हर्ष पर्वत और हर्षनाथ मंदिर बना है। पारिवारिक विवाद के बाद जयन्ती माता घर छोड़कर इस पहाड़ी पर तपस्या करने लगीं। वर्षों की तपस्या के बाद वे देवी शक्ति का स्वरूप बन गईं और “जीण माता” के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

औरंगजेब का आक्रमण

जीण माता मंदिर परिसर के पास स्थित हर्षनाथ मंदिर में ओरंगजेब द्वारा किये गए विध्वंस के चिन्ह आज भी स्पष्ट दिखाई देते हैं। भव्य दीवारों पर उकेरे अनुपम पौराणिक आख्यान, अदभुत पुरातात्विक कलाकृतियाँ आज धूल धूसरित खंडित जहां तहां बिखरी पड़ी है। माना जाता है कि जीण माता के मुख्य मंदिर को ध्वंस करने से पहले ही भँवरों/मधुमक्खियों ने औरंगजेब की सेना पर हमला कर दिया था जिससे उसकी सेना भाग खड़ी हुई और मुख्य मंदिर सुरक्षित रह गया। इसलिए जीण माता को भँवरों की देवी/ मधुमक्खियों वाली देवी भी कहा जाता है।

मेले का समय:

जीण माता मेला वर्ष में दो बार लगता है:

चैत्र नवरात्रि मेला – मार्च- अप्रैल

आश्विन नवरात्रि मेला – सितम्बर- अक्टूबर

मेले का धार्मिक महत्व:

जीण माता को शक्ति का अवतार माना जाता है। भक्त अपनी मनोकामना पूरी यहाँ नारियल व ध्वजा चढ़ाते हैं और पैदल यात्रा करते हैं।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व:

  • धार्मिक महत्व : शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र, शक्ति के अवतार के रूप में पूजित
  • सांस्कृतिक महत्व : राजस्थान की लोक संस्कृति का प्रदर्शन; लोक परंपराओं का संरक्षण
  • आर्थिक महत्व : स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन; स्थानीय लोगों के व्यवसाय और आय का स्रोत
  • लोकगीत और नृत्य : जीण माता के जीवन और कथाओं पर आधारितलोकगीत और नृत्य राजस्थान की संस्कृति का हिस्सा हैं।
  • समाज में एकता : पूरे हिन्दू समाज में समान रूप से पूजनीय। चौहान और मीणा समाज की कुलदेवी। सामाजिक एकता का प्रतीक।
  • युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा : जीण माता की कथाएँसाहस, भक्ति और नैतिकता का संदेश देती हैं।