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श्री महावीरजी रथयात्रा

श्री महावीरजी रथयात्रा

सांस्कृतिक एकात्मता और सामाजिक समरसता का अद्भुत उदाहरण

चंदनपुर का रोचक इतिहास

आज आपको राजस्थान के करौली जिले के चंदनपुर के लगभग 300 वर्ष पुराने रोचक इतिहास की ओर ले चलते हैं। लोक परंपरा के अनुसार एक ग्वाले की दुधारू गाय प्रतिदिन गोचर भूमि में चरने जाती थी और सायंकाल लौट आती थी, किंतु कुछ दिनों से वह दूध देना बंद कर चुकी थी। ग्वाले को आश्चर्य हुआ। एक दिन उसने छिपकर गाय की निगरानी की। उसने देखा कि गाय एक टीले के पास जाकर खड़ी हो जाती है और अपना सारा दूध उस टीले पर स्वतः ही उंडेल देती है। ऐसी चमत्कारिक घटना देखकर वह आश्चर्यचकित रह गया।

प्रतिमा का प्राकट्य

गाँव के बुजुर्गों की सलाह पर उस टीले की खुदाई करवाई गई। खुदाई के दौरान वहाँ से भगवान महावीर की एक प्राचीन प्रतिमा प्राप्त हुई। तब लोगों को समझ आया कि गाय उस स्थान पर अपना दूध क्यों अर्पित कर रही थी। इस चमत्कारिक घटना की चर्चा शीघ्र ही पूरे क्षेत्र में फैल गई और यह स्थान श्रद्धा का केंद्र बन गया।

मंदिर निर्माण और तीर्थ की स्थापना

कालांतर में जयपुर राज्य के दीवान जोधराज पल्लीवाल ने विक्रम संवत 1826 के लगभग वहाँ तीन शिखरों वाले भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। उसी समय से यह स्थान “श्री महावीरजी” के रूप में प्रसिद्ध हो गया और जैन समाज सहित समस्त क्षेत्र के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ बन गया।

रथयात्रा की परंपरा

वैशाख कृष्ण प्रतिपदा के दिन यहाँ भगवान महावीर की भव्य रथयात्रा निकाली जाती है। यह रथयात्रा मंदिर प्रांगण (कटला) से प्रारंभ होकर स्थानीय गंभीर नदी तक जाती है, जहाँ प्रतिमा का अभिषेक किया जाता है। इसके पश्चात प्रतिमा को पुनः रथ पर विराजमान कर मंदिर तक लाया जाता है। बाह्य दृष्टि से यह एक सामान्य धार्मिक अनुष्ठान प्रतीत होता है, किंतु इसके साथ भारत की सांस्कृतिक एकात्मता और सामाजिक सद्भाव एवं समरसता का अत्यंत प्रेरणादायक प्रसंग जुड़ा हुआ है।

उत्सव का प्रारंभ

महावीर जन्म कल्याणक (चैत्र शुक्ल त्रयोदशी) के दिन स्थानीय स्तर पर प्रभात फेरी के साथ उत्सव का प्रारंभ होता है। इसके तीन दिन बाद वैशाख कृष्ण प्रतिपदा को दोपहर में मंदिर प्रांगण से रथयात्रा प्रारंभ होती है और यहीं से सामाजिक सद्भाव एवं समरसता का अद्भुत दृश्य सामने आता है।

विभिन्न समुदायों की सहभागिता

स्थानीय परंपरा के अनुसार सर्वप्रथम सेवादास जाटव परिवार के प्रतिनिधि का मंदिर ट्रस्ट द्वारा माल्यारोपण एवं साफा पहनाकर सम्मान किया जाता है। इसके बाद वही व्यक्ति रथ को प्रथम धक्का देकर चलाता है। रथ का प्रारंभ इसी परिवार के सदस्य द्वारा किया जाना आवश्यक माना जाता है। इसके पश्चात स्थानीय मीणा समुदाय के लोग रथ को खींचते हैं। रथ में जुड़ने वाले बैलों की व्यवस्था भी मीणा समाज द्वारा ही की जाती है। गंभीर नदी पर प्रतिमा का अभिषेक जैन समुदाय द्वारा किया जाता है, जबकि वापसी में रथ को गुर्जर समाज के लोग खींचकर मंदिर तक लाते हैं। इस प्रकार इस रथयात्रा में जाटव (अनुसूचित जाति), मीणा (अनुसूचित जनजाति) और गुर्जर (अन्य पिछड़ा वर्ग) समुदाय पारंपरिक रूप से जैन समाज के साथ सहभागिता करते हैं। यह परंपरा सदियों से सामाजिक सद्भाव और समरसता का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती है।

एक रोचक प्रसंग

स्थानीय लोगों के अनुसार कुछ वर्ष पूर्व एक रोचक घटना भी घटी। मंदिर प्रशासन द्वारा एक नया मशीनीकृत रथ तैयार कराया गया। परंपरा के अनुसार सेवादास जाटव परिवार के सदस्य का हाथ लगवाए बिना ही उस रथ को चलाने का प्रयास किया गया, किंतु वह रथ प्रारंभ होते ही क्षतिग्रस्त हो गया और मशीनीकृत व्यवस्था विफल रही। तत्पश्चात पारंपरिक रथ को पुनः निकाला गया, जाटव परिवार का सम्मान किया गया और उनके हाथ से रथ का प्रारंभ कराया गया। इसके बाद मीणा समाज द्वारा बैलों की जोड़ी से रथ खींचकर सभी अनुष्ठान सफलतापूर्वक संपन्न किए गए।

सांस्कृतिक एकात्मता का जीवंत उदाहरण

यह रथयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकात्मता, सामाजिक सद्भाव एवं समरसता का सशक्त प्रतीक है। विभिन्न समुदायों की सहभागिता इस तथ्य को प्रमाणित करती है कि आस्था और परंपरा समाज को जोड़ने का माध्यम बन सकती है। श्री महावीरजी की यह परंपरा आज भी उसी भाव के साथ जीवित है और सामाजिक समरसता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है।