समाज एवं संस्कृति अध्ययन केंद्र राजस्थान

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सांस्कृतिक मार्क्सवाद

सांस्कृतिक मार्क्सवाद एक ऐसी विचारधारा है, जो पारंपरिक मूल्यों, संस्कृति, और सभ्यता को नष्ट कर एक नए सामाजिक ढांचे की स्थापना का प्रयास करती है। आर्थिक वर्ग संघर्ष के आधार पर खड़ा हुआ मार्क्सवाद का विचार वर्तमान समय में पूरी दुनियाँ में अप्रासंगिक हो चुका है। इसलिए वह अपने नए रूप सांस्कृतिक मार्क्सवाद के रूप में उभरा है। मार्क्सवाद के अनुसार इसका उद्देश्य परिवार, धर्म, और राष्ट्र जैसी पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं को चुनौती देकर एक “नए सांस्कृतिक आदर्श” को स्थापित करना है मतलब यह एक ऐसी वैचारिक योजना है, जो पारंपरिक परिवार, धर्म, नैतिकता, और राष्ट्रीय पहचान को कमजोर करने का कार्य करती है, ताकि समाज को वामपंथी उद्देश्यों के लिए तैयार किया जा सके। फ्रैंकफर्ट स्कूल और सांस्कृतिक मार्क्सवाद का विचार यही 2 विचार सांस्कृतिक मार्क्सवाद का मूल आधार है। इस आधार पर सांस्कृतिक मार्क्सवाद समाज को 2 हिस्सों में बाँटता है – शोषक और शोषित (oppressor and oppressed) उदाहरण के लिए भारत के संदर्भ में देखें तो वामपंथी कम्युनिस्ट निम्न वर्गों में आपस में विरोधी घोषित कर वर्ग संघर्ष पैदा करते हैं। सांस्कृतिक मार्क्सवाद के प्रभाव भारत में सांस्कृतिक मार्क्सवाद धीरे-धीरे पारिवारिक, सांस्कृतिक, और राष्ट्रीय मूल्यों को चोट पहुंचाने का कार्य कर रहा है। 1. पारिवारिक मूल्यों पर हमला – 2. धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का मखौल उड़ाकर उनको महत्वहीन करना – 3. राष्ट्रीयता और देशभक्ति पर प्रहार- 4. शिक्षा और कला का राजनीतिकरण: निष्कर्ष सांस्कृतिक मार्क्सवाद एक ऐसी चुनौती है, जो भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक, और पारिवारिक संरचनाओं को कमजोर कर रही है। इसे रोकने के लिए आवश्यक है कि भारतीय समाज सांस्कृतिक मार्क्सवाद के षड्यंत्रों को समझे। अपने सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं के महत्व को समझते हुए आधुनिकता के साथ संतुलन बनाए। जागरूकता, शिक्षा, और सामूहिक प्रयास ही इस विषैली विचारधारा के प्रभाव को समाप्त करने के प्रमुख साधन हो सकते हैं। संदर्भ: 1. http://1. https://plato.stanford.edu/entries/critical-theory/ 2. http://1. https://plato.stanford.edu/entries/critical-theory/ 3. https://timesofindia.indiatimes.com/india/sc-protects-prashant-bhushan-from-arrest-for-opium-tweet-on-ramayana-re-telecast/articleshow/75497237.cms 4. https://timesofindia.indiatimes.com/india/sc-protects-prashant-bhushan-from-arrest-for-opium-tweet-on-ramayana-re-telecast/articleshow/75497237.cms 5. https://timesofindia.indiatimes.com/india/sc-protects-prashant-bhushan-from-arrest-for-opium-tweet-on-ramayana-re-telecast/articleshow/75497237.cms 6. https://timesofindia.indiatimes.com/india/sc-protects-prashant-bhushan-from-arrest-for-opium-tweet-on-ramayana-re-telecast/articleshow/75497237.cms

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कितना विश्वसनीय है ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI)!

दुनिया में भारत अनाज का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। देश की आवश्यकता से अधिक यहाँ अन्न उत्पादन होता है। इसके पास व्यापक खाद्य आपूर्ति प्रणाली, मजबूत सरकारी नीतियाँ और वंचितों के लिए मुफ्त खाद्यान्न योजनाएं एवं वितरण प्रणाली है।
पिछले 10 वर्षों में भारत की प्रति व्यक्ति आय दोगुनी से भी ज़्यादा हो गई है।

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संवर्धिनी- महिला विषयक भारतीय दृष्टिकोण

भारतीय जीवन दृष्टि मानव जीवन के बारे में है। मानव यानि मनुष्य, जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों समाहित हैं। हमारे शास्त्रों में जो भी कहा गया है, वह मनुष्य मात्र के लिए कहा गया है, स्त्री और पुरुष को अलग देखना भारत की दृष्टि नहीं। हमारे यहॉं शिव और शक्ति एक हैं, दोनों मिलकर अर्द्धनारीश्वर बनते हैं।

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सुशासन की प्रतिमूर्ति, पुण्यश्लोका, लोकमाता अहिल्याबाई

महारानी अहिल्याबाई होलकर का जीवन भारतीय इतिहास में महिला नेतृत्व , समर्पण और जनसेवा का अनुपम उदाहरण है। वे न केवल इंदौर राज्य की रानी थीं, बल्कि भारतीय नारी शक्ति और आदर्श नेतृत्व की प्रतीक भी थीं।

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समाज में हो स्व का गौरव

भारत के वैभवशाली और गौरवशाली इतिहास का यह एक लंबा कालखंड है, तो उसके साथ-साथ परतंत्रता का भी एक हजार वर्ष का काला अध्याय है। विदेशी आक्रमणों व संघर्षों के शिकार होने के कारण हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, वैज्ञानिक, राजनीतिक व्यवस्था एवं शिक्षा प्रणाली पर गहरी चोटे पहुंची या यूं कह सकते हैं कि योजना पूर्वक पहुंचाई गई।

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हिन्दुत्व के शाश्वत सिद्धांत

हिन्दुत्व, जो न केवल एक धार्मिक परंपरा है बल्कि एक गहन जीवन-दर्शन भी है, आज वैश्विक विमर्श का एक महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। यह शब्द, सर्वकालिक एवं सर्वसामान्य होते हुए भी, समयानुकूल संदर्भ के साथ नए अर्थ और व्याख्याएं प्राप्त कर रहा है। बाकी सभ्यता, संस्कृतियों की तुलना में जब हम देखते हैं तो पाते हैं कि हिन्दू समाज जड़ नहीं है, प्रोग्रेसिव है इसलिए समय काल परिस्थिति के अनुसार फिर चिंतन करता है, आवश्यकता अनुसार परिवर्तन करता है और आगे बढ़ता है। इसीलिए यह दुनियाँ का सबसे प्राचीन धर्म होते हुए भी यह नित्य नवीन बना हुआ है।

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क्या है भारतीय परिप्रेक्ष्य में राष्ट्र की अवधारणा

पहले वे लोग, जो कहते हैं कि भारत 1947 में जन्मा राष्ट्र है, जिसे अंग्रेजों ने बनाया और हमें सौंपा। उससे पूर्व यहाँ कुछ रियासतें थी और अलग अलग स्वायत्त राज्य थे। कुछ लोग अनजाने में कहते भी हैं “we are a nation in making” या “we are the youngest nation in the world” दूसरे वे लोग जो कहते हैं कि भारत एक राष्ट्र नहीं है, यह अनेक राष्ट्रों का समूह है। यहाँ विभिन्न राष्ट्रीयताएं बसती हैं। इसलिए “India is a subcontinent भारत उपमहाद्वीप है”। तीसरे वे लोग हैं, जो कहते हैं कि भारत एक राष्ट्र है, प्राचीन राष्ट्र है, सनातन राष्ट्र है। यह बात शास्त्र सिद्ध है, इतिहास सिद्ध है और अनुभव सिद्ध भी है।

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