समाज एवं संस्कृति अध्ययन केंद्र राजस्थान

सांस्कृतिक मार्क्सवाद

सांस्कृतिक मार्क्सवाद एक ऐसी विचारधारा है, जो पारंपरिक मूल्यों, संस्कृति, और सभ्यता को नष्ट कर एक नए सामाजिक ढांचे की स्थापना का प्रयास करती है। आर्थिक वर्ग संघर्ष के आधार पर खड़ा हुआ मार्क्सवाद का विचार वर्तमान समय में पूरी दुनियाँ में अप्रासंगिक हो चुका है। इसलिए वह अपने नए रूप सांस्कृतिक मार्क्सवाद के रूप में उभरा है। मार्क्सवाद के अनुसार इसका उद्देश्य परिवार, धर्म, और राष्ट्र जैसी पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं को चुनौती देकर एक “नए सांस्कृतिक आदर्श” को स्थापित करना है मतलब यह एक ऐसी वैचारिक योजना है, जो पारंपरिक परिवार, धर्म, नैतिकता, और राष्ट्रीय पहचान को कमजोर करने का कार्य करती है, ताकि समाज को वामपंथी उद्देश्यों के लिए तैयार किया जा सके।

फ्रैंकफर्ट स्कूल और सांस्कृतिक मार्क्सवाद का विचार

  • थियोडोर अडोर्नो और मैक्स होर्कहाइमर (Theodor Adorno and Max Horkheimer) ने “क्रिटिकल थ्योरी” का विकास किया, जिसमें सभ्यता, संस्कृति एवं जीवन मूल्यों को दमन और अन्याय के एक माध्यम के रूप में देखा गया। उनका मानना था कि आधुनिक समाज केवल आर्थिक या राजनीतिक संस्थानों के माध्यम से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक माध्यमों के द्वारा भी सत्ता बनाए रखता है। [1]
  • एंटोनियो ग्राम्शी (Antonio Gramsci) ने “Cultural Hegemony” सांस्कृतिक आधिपत्य का सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार, सत्ताधारी वर्ग अपना वर्चस्व और सत्ता बनाए रखने के लिए संस्कृति और मूल्यों का उपयोग करता है। अतः ग्राम्शी ने तर्क दिया कि शासक वर्ग के से संघर्ष करने के लिए सांस्कृतिक मूल्यों का विरोध कर अन्य वर्गों को अपनी नई विचारधारा/संस्कृति बनानी चाहिए। [2]

यही 2 विचार सांस्कृतिक मार्क्सवाद का मूल आधार है।

इस आधार पर सांस्कृतिक मार्क्सवाद समाज को 2 हिस्सों में बाँटता है – शोषक और शोषित (oppressor and oppressed)

उदाहरण के लिए भारत के संदर्भ में देखें तो वामपंथी कम्युनिस्ट निम्न वर्गों में आपस में विरोधी घोषित कर वर्ग संघर्ष पैदा करते हैं।

  • शोषक – शोषित
  • बहुसंख्यक – अल्पसंख्यक
  • ब्राह्मण – अनुसूचित जाति (दलित)
  • पुरुष – महिला
  • माता – पिता युवा
  • गुरु – शिष्य
  • नगरीय समाज – जनजाति (आदिवासी )
  • हिंदी – तमिल/ तेलगू/ कन्नड आदि
सांस्कृतिक मार्क्सवाद के प्रभाव

भारत में सांस्कृतिक मार्क्सवाद धीरे-धीरे पारिवारिक, सांस्कृतिक, और राष्ट्रीय मूल्यों को चोट पहुंचाने का कार्य कर रहा है।

1. पारिवारिक मूल्यों पर हमला –

  • पारंपरिक भारतीय परिवार की भूमिका को “पितृसत्तात्मक” और “दमनकारी” बताकर कमजोर किया जा रहा है।
  • विवाह और परिवार की संस्था पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं, जिससे तलाक और लिव-इन रिलेशनशिप जैसी प्रवृत्तियों में लगातार वृद्धि हो रही है।
  • स्वतंत्रता और आजादी के नाम पर युवा पीढ़ी को परिवार और बुजुर्गों से दूर किया जा रहा है। इस कारण वृद्धाश्रम और अनाथाश्रम की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।

2. धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का मखौल उड़ाकर उनको महत्वहीन करना –

  • भारतीय परंपराओं, त्योहारों और रीति-रिवाजों को पर्यावरण, लैंगिक समानता, और प्रगतिशीलता के विपरीत बताया जाता है। दिवाली पर प्रदूषण, होली पर पानी की बर्बादी, गणेश विसर्जन पर नदी तालाब को खराब करने, और राखी जैसे त्योहार को पितृसत्तात्मकता का रंग दिया जाता है।
  • विशेषकर हिंदू धर्म और इसकी परंपराओं को “अंधविश्वास” और “अधिकारों का हनन” बताकर हाशिए पर ले जाने का प्रयास किया जा रहा है।
  • वामपंथी इतिहासकारों और विचारकों द्वारा भारतीय संस्कृति एवं समाज को “ब्राह्मणवादी”, ”पुरुष-प्रधान” और “जातिवादी” बताकर मानवता-विरोधी संस्कृति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और धर्म को अफीम की गोली कहकर उसको नकारा जाता है।[3]

3. राष्ट्रीयता और देशभक्ति पर प्रहार-

  • सांस्कृतिक मार्क्सवाद के प्रभाव में देशभक्ति और राष्ट्रवाद को “सांप्रदायिकता” और “फासीवाद” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
  • Chest-thumping nationalism और jingoism जैसे शब्दों का उपयोग करके देशभक्ति को गलत सिद्ध कर दिया जाता है। [4]
  • “अलगाववादी आंदोलन” और “टुकड़े-टुकड़े गैंग” जैसे समूह सांस्कृतिक मार्क्सवाद से प्रभावित होकर भारतीय एकता को कमजोर कर रहे हैं। [5]

4. शिक्षा और कला का राजनीतिकरण:

  • लज्जा, pk, ओ माय गॉड़, हैदर, वाटर जैसी बॉलीवुड फिल्मों के माध्यम से मनोरंजन उद्योग सांस्कृतिक मार्क्सवाद के उपकरण बन गए हैं, जो पारंपरिक भारतीय मूल्यों को गलत ढंग से प्रस्तुत करके वामपंथी विचारों को बढ़ावा देते हैं।
  • भारतीय शिक्षा प्रणाली में वामपंथी विचारधारा का प्रभाव बढ़ाकर इतिहास और परंपराओं का विकृतिकरण किया गया है। भारत के प्राचीन गौरव और परंपराओं को ” mythology अथवा मिथक” बताकर उन्हें “विज्ञान विरोधी” घोषित किया जाता है और फिर उनका मजाक उड़ाया जाता है। [6]

निष्कर्ष

सांस्कृतिक मार्क्सवाद एक ऐसी चुनौती है, जो भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक, और पारिवारिक संरचनाओं को कमजोर कर रही है। इसे रोकने के लिए आवश्यक है कि भारतीय समाज सांस्कृतिक मार्क्सवाद के षड्यंत्रों को समझे। अपने सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं के महत्व को समझते हुए आधुनिकता के साथ संतुलन बनाए। जागरूकता, शिक्षा, और सामूहिक प्रयास ही इस विषैली विचारधारा के प्रभाव को समाप्त करने के प्रमुख साधन हो सकते हैं।

संदर्भ:

1. http://1. https://plato.stanford.edu/entries/critical-theory/

2. http://1. https://plato.stanford.edu/entries/critical-theory/

3. https://timesofindia.indiatimes.com/india/sc-protects-prashant-bhushan-from-arrest-for-opium-tweet-on-ramayana-re-telecast/articleshow/75497237.cms

4. https://timesofindia.indiatimes.com/india/sc-protects-prashant-bhushan-from-arrest-for-opium-tweet-on-ramayana-re-telecast/articleshow/75497237.cms

5. https://timesofindia.indiatimes.com/india/sc-protects-prashant-bhushan-from-arrest-for-opium-tweet-on-ramayana-re-telecast/articleshow/75497237.cms

6. https://timesofindia.indiatimes.com/india/sc-protects-prashant-bhushan-from-arrest-for-opium-tweet-on-ramayana-re-telecast/articleshow/75497237.cms

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