भारत विभाजन और पाकिस्तान निर्माण विषय पर डॉ अंबेडकर के विचार उनकी पुस्तक पाकिस्तान या भारत का विभाजन में स्वयं डॉ अंबेडकर द्वारा विस्तृत रूप से प्रस्तुत किए गए है।
सुधीर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. अंबेडकर की उक्त पुस्तक से डॉ. अंबेडकर के कांग्रेस, मुस्लिम लीग, हिंदू–मुस्लिम संबंध, भारत की सुरक्षा तथा सांप्रदायिक शांति जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर प्रमुख उद्धरणों को पृष्ठ-संख्या के साथ संकलित किया गया है।
राष्ट्रीय सुरक्षा पर
- पृष्ठ क्रमांक 113 पर डॉ. अंबेडकर लिखते है की “हिंदुस्तानी फौज में मुसलमानों की बहुलता है। जिन मुसलमानों की बहुलता है, वे पंजाब और उत्तर–पश्चिमी सीमा प्रांत के हैं। हिंदुस्तानी फौज की इस संरचना का मतलब यह हुआ कि केवल पंजाब और पश्चिमी सीमा प्रांत के मुसलमानों को ही हिंदुस्तान पर बाहर से होने वाले हमलों से रक्षा करने का काम सौंपा गया है। अकसर कहते हुए सुना जा सकता है कि वे हिंदुस्तान के द्वारपाल हैं।”
‘’यदि अफगान अकेले अपने बूते पर या अन्य मुस्लिम देशों के साथ मिलकर भारत पर हमला करे, तब ये द्वारपाल हमलावर को रोकेंगे या उन्हें भीतर आने देंगे? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसकी कोई भी हिंदू उपेक्षा नहीं कर सकता। और चूँकि यह अत्यंत ही महत्वपूर्ण निर्णायक विषय है, और अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णायक प्रश्न, इसलिए हर हिंदू को इस बारे में पूरी तरह आश्वस्त होना चाहिए।”
- पृष्ठ क्रमांक 115 पर डॉ. अंबेडकर लिखते है की “क्या हिंदू लोग अफगानिस्तान के आक्रमण के समय ऐसी फौज पर निर्भर रह सकते हैं? केवल तथाकथित राष्ट्रवादी इस प्रश्न का उत्तर हाँ में देंगे। परंतु यथार्थवादियों में सबसे साहसी लोग भी इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले अवश्य सोचेंगे। यथार्थवादी इस बात को अवश्य नोट करेंगे कि मुसलमान हिंदुओं को काफिर समझते हैं; जिनकी रक्षा करने की जगह उनका जड़ से समाप्त कर देना चाहिए। मुसलमान ब्रिटीशर्स को अपने से श्रेष्ठ मान लेता है, परंतु हिंदुओं को अपने से घटिया मानकर चलता है। यह बात संदेहजनक है कि मुसलमानों की कोई रेजीमेंट आखिर तक हिंदू अफसरों के मातहत काम करेगी और उन्हें स्वीकार करेगी।”
- पृष्ठ क्रमांक 117 पर डॉ. अंबेडकर लिखते है की “यदि हिंदुस्तान राजनीतिक दृष्टि से एक देश बना रहता है, और पाकिस्तान द्वारा निर्मित द्वि-राष्ट्र वाली मनोवृत्ति उस पर थोपी जाती रहती है, तो जहाँ तक रक्षा का प्रश्न है, हिंदुओं को लगेगा की उसके एक तरफ खाई है और दूसरी तरफ कुआ। फौज तो होगी, पर लीग के कारण अपनी इच्छा से उसका उपयोग नहीं किया जा सकेगा। यदि इस्तेमाल भी किया जाएगा तो भी संदेहस्पद वफादारी के कारण उस पर निर्भर नहीं रहा जा सकेगा। यह स्थिति जितनी दुखदायी है, उतनी ही संदिग्ध और खतरनाक भी। यदि फौज में उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और पंजाब के मुसलमानों का वर्चस्व बना रहा तो हिंदुओं को इसका खर्च तो उठाना पड़ेगा, परंतु वे उसका इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे, और यदि इस्तेमाल किया भी तो उस पर निर्भर रहना खतरे से खाली नहीं होगा।”
- पृष्ठ क्रमांक 117 पर डॉ. अंबेडकर लिखते है की “हिंदुओं को एक कठिन विकल्प अपनाना है सुरक्षित सेना हो या सुरक्षित सीमा। इस कठिनाई में हिंदुओं के सामने सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण तरीका क्या होगा? क्या उनका हित इस बात पर जोर देने में है कि पश्चिमी हिंदुस्तान हिंदुओं का एक भाग बना रहे, ताकि उसे एक सुरक्षित सीमा मिल सके? इस क्षेत्र के मुसलमान हिंदुओं के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखते हैं, इस बारे में कोई संदेह नहीं किया जा सकता। फिर हिंदुओं के लिए बेहतर क्या होगा? मुसलमानों के बिना और उन्हें अपना विरोधी बनाकर रखा जाए या मुसलमानों के साथ रहकर उन्हें अपना विरोधी बनाकर रखा जाए? यदि यह प्रश्न किसी बुद्धिमान विवेकवान पुरुष से पूछा जाए तो वह इसका केवल एक ही उत्तर देगा यदि मुसलमानों को विरोधी बनाकर रखना ही है तो अच्छा यही होगा कि मुसलमानों के बिना उनका विरोधी बनकर रहा जाए, न कि उनके साथ रहकर।”
- अलगाववादी मुसलमानों को देश की सुरक्षा के लिए खतरा मानते हुए पृष्ठ क्रमांक 118 पर अंबेडकर लिखते है कि “इसका एक ही तरीका है, और वह यह कि पाकिस्तान की योजना का समर्थन किया जाए। एक बार जब पाकिस्तान बन जाएगा तो हिंदुस्तान के पास जन और धन के रूप मे पर्याप्त संसाधन होने के कारण वह एक ऐसी फौज रख सकेगा जिसे वह अपना कह सके और उसे यह डर देने वाला कोई नहीं होगा कि उसका इस्तेमाल कैसे किया जाए और किसके विरुद्ध किया जाए। इस तरह, पाकिस्तान बनने से हिंदुस्तान की रक्षा कमजोर होने की जगह निश्चित रूप से सुधर जाएगी।”
- पृष्ठ क्रमांक 119-120 पर डॉ. अंबेडकर लिखते है की “केंद्रीय सरकार का कुल राजस्व 121 करोड़ रुपए होता है। इसमें से लगभग 52 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष फौज पर खर्च किए जाते हैं। फौज पर जो ये 52 करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं, उसका अधिकांश पाकिस्तान-क्षेत्र की मुस्लिम फौज पर खर्च किया जाता है। अब इन 52 करोड़ रुपए में से अधिकांश हिंदू प्रांतों से मिलता है और वह एक ऐसी फौज पर खर्च जाता है जिससे अधिकांश गैर-हिंदू हैं। इस दर्दनाक स्थिति को कितने हिन्दू जानते है ? कितने लोग जानते हैं कि यह दर्दनाक स्थिति किस कीमत पर बनाई जा रही है? आज हिंदू इसके लिए इसलिए जिम्मेदार नहीं हैं कि वे इसे रोक नहीं सकते। प्रश्न यह है कि क्या वे इस दर्दनाक स्थिति को चलते रहने देंगे? यदि वे इसे रोकना चाहते हैं तो इसका सबसे निश्चित तरीका यह है कि पाकिस्तान की योजना को प्रभावी होने दिया जाए। इसका विरोध करना अपने विनाश के लिए स्वयं सहायक हथियार खरीदना है। सुरक्षित सीमा से सुरक्षित फौज बेहतर होती है।”
सांप्रदायिक तनाव
- पृष्ठ क्रमांक 124 पर डॉ. अंबेडकर लिखते है की “यदि हिंदू प्रांतों में मुस्लिम अल्पसंख्यकों को आत्मनिर्णय का अधिकार दिया गया तो प्रश्न उठता है कि मुस्लिम प्रांतों में हिंदू अल्पसंख्यकों को भी निर्वाचक मण्डल के बारे में आत्मनिर्णय का अधिकार क्यों नहीं दिया गया? इस प्रश्न का उत्तर क्या है? और यदि इसका कोई उत्तर नहीं, तो ब्रिटिश सरकार के कम्युनल अवॉर्ड मे निसंदेह घोंर् पक्षपात किया गया है और उसे दूर किया जाना चाहिए।”
- नाजायज अधिकारों की मांग के लिए हिंदुओं के साथ हिंसा को हथियार मानने वाले मुस्लिम नेताओं की बात को स्पष्ट करते हुए पृष्ठ क्रमांक 130 पर डॉ अंबेडकर लिखते हैं कि – “मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के भाषण से स्पष्ट है जो उन्होंने 1927 में मुस्लिम लीग के कलकत्ता-अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में भी दिया था। अपने भाषण में मौलाना ने घोषणा की: “अब पाँच मुस्लिम प्रांतों के मुकाबले में नो हिंदू प्रांत होंगे और इन नो प्रांतों मे हिन्दू मुस्लिमों से जैसे बर्ताव करेंगे पाँच प्रांतों में मुस्लिम हिंदुओं से वैसा ही बर्ताव करेंगे। क्या यह एक बहुत बड़ा लाभ नहीं है? क्या यह मुस्लिम अधिकारों को जताने का नया हथियार नहीं मिल गया?”
- पृष्ठ 132 – “पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों के पास कोई ऐसी केंद्रीय शक्ति नहीं रहेगी कि वे किसी ऐसी बाहरी सत्ता के पास जा सकें जिसके पास उन्हें दबाकर रखने की शक्ति हो और जो (हिंदुओं की) ओर से हस्तक्षेप कर सके और उनका आश्रय न होने दे, क्योंकि उसमें उन्हें दबाकर रखने वाली सत्ता की व्यवस्था ही नहीं है। ऐसी दशा में पाकिस्तान में हिंदुओं की दशा आसानी से ऐसी हो जाएगी, जैसी तुर्की के अधीन आर्मीनियनों की थी या यहूदियों की जार के रूस और नाजी जर्मनी में है। ऐसी कोई भी योजना असहनीय होगी और हिंदू यह व्यवस्था सह नहीं सकते हैं कि उन्हें पाकिस्तान सरकारों की कृपा पर अपने आबाद सहधर्मियों को एक मुस्लिम राष्ट्र में धर्मांधों का शिकार बनते वे देखते रहें।”
- हिन्दू मुस्लिम आबादी की पूर्ण अदला बदली के पक्ष में अपनी बात रखते हुए पृष्ठ क्रमांक 135 पर अंबेडकर लिखते है की “यह बात निश्चित है कि सांप्रदायिक शांति स्थापित करने का टिकाऊ तरीका अल्पसंख्यकों की अदला-बदली ही है। यदि यही बात है तो फिर यह व्यर्थ होगा कि हिंदू और मुस्लिम सरक्षण के ऐसे उपाय खोजने मे लगे रहे जो इतने असुरक्षित पाए गए हैं। यदि यूनान, तुर्की और बुल्गारिया जैसे सीमित साधनों वाले छोटे-छोटे देश भी यह काम पूरा कर सके, तो यह मानने का कोई कारण नहीं कि हिंदुस्तानी ऐसा नहीं कर सकते। फिर यहा तो बहुत कम जनता की अदला बदली करने की आवश्यकता पड़ेगी, और चूँकि कुछ ही बाधाओं को दूर करना है, इसलिए सांप्रदायिक शांति स्थापित करने के एक निश्चित उपाय को न अपनाना अत्यंत उपहासास्पद होगा।”
इस्लामिक मान्यता को लेकर डॉ. अंबेडकर के विचार:-
- पृष्ठ क्रमांक 45 पर अंबेडकर लिखते है की “हिन्दू राष्ट्रीय आंदोलन के अनुसार इतिहास मे हिन्दू लोग पृथ्वीराज, प्रताप, वीरवैरागी, शिवाजी का स्मरण करते है जो इस भूमि के सम्मान और स्वतंत्रता के लिए मुसलमानों के विरुद्ध लड़े जबकि मुसलमान भारत पर हमला करने वाले मोहमद बिन कासिम और औरंगजेब को अपना राष्ट्र पुरुष स्वीकार करते है। हिन्दू रामायण, महाभारत, गीता से प्रेरणा लेते है वही मुसलमान कुरान और हदीस से।”
- मुस्लिम आक्रान्ताओं के हमले का उल्लेख करते हुए पृष्ठ क्रमांक 63 पर डॉ अंबेडकर लिखते हैं कि “इस बात मे कोई संदेह नहीं है की भारत मे मूर्ति पूजा और हिन्दुओ के बहुदेववाद पर प्रहार कर भारत मे इस्लाम की स्थापना करना इन हमलों का उद्देश्य था।”
- हज्जाज को भेजे गए एक पत्र मे मोहम्मद बिन कासिम का यह उल्लेख है:- [पृष्ठ क्रमांक 64]
“राजा दाहिर के भतीजे, उसके योद्धाओ और प्रमुख अधिकारियों को ठिकाने लगा दिया गया है और मूर्तिपूजकों को या तो इस्लाम में दीक्षित कर दिया गया है अथवा उन्हें तबाह कर दिया गया है। मूर्तियोंवाले मंदिरों के स्थान पर मस्जिद और अन्य इबादत-स्थल बनाए गए हैं। कुरआन पढ़ी जाती है, अज़ान दी जाती है, ताकि निर्धारित घंटों पर इबादत हो सके। तकबीर और अल्लाह-हो-अकबर की सदाएं हर सवेरे-शाम गूंजती हैं।”
- इसे प्राप्त करने के बाद हज्जाज ने अपने सेनापति को निम्नलिखित पत्र भेजा था:[64]
“इसके अलावा तुम सभी बड़े और छोटे को सुरक्षा दो। शत्रु और मित्र में भेद न करो। खुदा का कथन है कि मूर्तिपूजकों से कोई रियायत न बरतो, अपितु उनके गले काट दो। यह समझ लो कि यही महान अल्लाह का आदेश है। तुम्हें अभयदान देने के लिए तुरंत तैयार नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे तुम्हारा काम और बढ़ जाएगा। इसके बाद उन दुश्मनों के अलावा जो सामान्य सैनिक हैं किसी को न बख्शो।”
- गजनी के मुहम्मद ने भी भारत पर अपने अनेक हमलों को जिहाद छेड़ने की संज्ञा दी थी। मुहम्मद के इतिहासकार अल उतबी ने उसके हमलों के बारे में लिखा था:
“उसने मंदिरों में मूर्तियों को तोड़ा और इस्लाम की स्थापना की। उसने शहरों पर कब्जा किया, नापाक कमीनों को मार डाला, मूर्ति-पूजकों को तबाह किया और मुसलमानों को गौरवान्वित किया। तत्पश्चात वह घर लौटा और इस्लाम के लिए की गई विजयों का ब्योरा दिया और यह संकल्प व्यक्त किया कि वह हर वर्ष हिंद के खिलाफ जिहाद करेगा।”
- मुहम्मद गोरी भी भारत पर हमलों में उसी मज़हबी उन्माद से प्रभावित था। इतिहासकार हसन निजामी ने उसके क्रियाकलाप का विवरण इन शब्दों में दिया है:[65]
“उन्होंने अपनी तलवार से हिंद को कुफ्र की गंदगी से साफ किया और पाप से मुक्त किया तथा उस सारे मुल्क को बहुदेववाद के कंटक से स्वच्छ किया और मूर्तिपूजा की अपवित्रता से पाक किया, और अपने शाही दिलेरी का प्रदर्शन करते हुए एक भी मंदिर को खड़ा नहीं रहने दिया।”
- तैमूर ने अपने संस्मरण में स्पष्ट किया है कि उसे किन कारणों ने भारत पर हमला करने को प्रेरित किया। वह कहता है: “हिंदुस्तान पर हमलों का मेरा मकसद काफ़िरों के खिलाफ अभियान चलाना और मुहम्मद के आदेशानुसार उन्हें सच्चे दीन में धर्मांतरित करना है। (उस पर और उसके परिवार पर अल्लाह की दया और रहमत हो) उस धरती को मिथ्या आस्था और बहुदेववाद से पवित्र करना है। तथा मंदिरों और मूर्तियों का विध्वंस करना है। हम गाज़ी और मुजाहिद होंगे और अल्लाह की नज़र में सहयोगी और सैनिक सिद्ध होंगे।” पृष्ठ क्रमांक 65
- मुसलमान तातार, अफ़गान और मँगोल थे ये सभी आक्रमणकर्ता परस्पर प्रेम की भवन से संपुष्ट हुआ कोई ऐसा परिवार नहीं था जो मुसलमान भाईचारे की भावना से एकजुट हो। वे एक दूसरे के जानी दुश्मन थे और उनके युद्धों का मकसद एक दूसरे का सफाया करना भी था। पर अपने सभी विवादों और संघर्षों के बावजूत वे सभी इस सामूहिक उद्देश्य से प्रेरित थे “हिन्दू धर्म का विध्वंस”। [65]
- मुहम्मद बिन कासिम ने मज़हबी उन्माद मे जो पहला कार्य किया, वह था देवल नगर पर अधिकार कर लेने के बाद वहां के ब्राह्मणों का खतना कराना। परंतु जब उसे यह पता लगा कि वे इस तरह के धर्मांतरण पर आपत्ती उठा रहे है तो उसने सत्रह वर्ष से अधिक की आयु वाले सभी लोगों का वध करा दिया और यह आदेश दिया कि अन्य सभी को, जिनमें औरतें और बच्चे भी शामिल थे, गुलाम बना लिया जाए। हिन्दुओं के मंदिरों को लूटा गया और लूट की इस संपदा के पाँचवें हिस्से को अलग करके, जोकि सरकार का कानूनी हिस्सा था, शेष सारी सम्पदा सैनिकों में बराबर-बराबर बांट दी गई। [66]
- मुहम्मद गजनी ने प्रारंभ से ही ऐसी योजनाएँ अपनाई जिनसे हिंदुओं के हृदय में आतंक व्याप्त हो सके। सन 1001 में राजा जयपाल को पराजित करने के बाद मुहम्मद ने आदेश दिया कि जयपाल को सड़कों पर घुमाया जाए ताकि उसके बेटे और सरदार उसे लज्जा, खेद और अपमान की उस हालत में देख सकें और देश भर के काफिरों के दिलों में इस्लाम की ताकत का खौफ बैठ जाए। [66]
डॉ अंबेडकर टाइटस की पुस्तक का उल्लेख करते हुए बताते है :
“मंदिरों के विध्वंस और प्रतिमाओं को अपवित्र किए जाने के पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं। हम देख चुके हैं कि मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध में योजनाबद्ध ढंग से विनाश की अपनी योजना को क्रियान्वित किया था। परंतु उसने राजस्व के मकसद से मुलतान के एक सुप्रसिद्ध मंदिर को छोड़ दिया था, क्योंकि यह मंदिर तीर्थयात्रियों का आवास स्थल था, जो प्रतिमा के सामने काफी बड़ी मात्रा में उपहार समर्पित” करते थे। साथ ही उसने जहाँ इस मंदिर को अपनी धनलोलुपता को संतुष्ट करने के लिए खड़ा रहने दिया, वहीं उसने गौ-मांस का एक टुकड़ा प्रतिमा की गर्दन में बाँधकर अपनी घृणा-भावना को भी उजागर किया। [67]
- “मिनहाज-उस-सिराज यह भी बताता है कि मुहम्मद किस तरह से एक हजार मंदिरों तथा सोमनाथ के मंदिरों को ध्वस्त करने वाले तथा उसकी प्रतिमा को ले जाने का सार्वजनिक ढंग करने वाले के रूप में व्यापक तौर पर चर्चित हो गया था। उसका यह भी दावा था कि मूर्ति के चार टुकड़े कर दिए गए थे। उसका एक भाग गजनी की जामी मस्जिद में जमा कराया गया, एक को उसके राज महल के द्वार पर रख दिया गया और तीसरा भाग मक्का तथा चौथा मदीना भेजा गया।”[67]
- लेन पूल की पुस्तक का उल्लेख करते हुए डॉ अंबेडकर ने लिखा – “मुहम्मद गजनी ने, जिसने यह संकल्प किया था कि वह हिंदुओं के काफिरों के खिलाफ हर वर्ष जिहाद करेगा और बाद में अपना मूर्ति-भंजन-अभियान चलाता रहा जब तक कि सोमनाथ का मंदिर अक्षत है। इसी विशेष उद्देश्य से उसने अपनी जीवन-लीला समाप्त होने से कुछ ही समय पूर्व मुल्तान के अंहलवाड़ा के तटवर्ती क्षेत्र के रेगिस्तान को पार कर भयानक चढ़ाई की ओर वह तब तक युद्ध करता रहा, जब तक कि उसने अंततः इस सुप्रसिद्ध मंदिर को ध्वस्त नहीं कर दिया”। [67]
- संविधान/ कानून के लिए मुस्लिम व्यवहार का उल्लेख करते हुए पृष्ठ क्रमांक 348 पर अंबेडकर लिखते है कि “इस्लाम के सिद्धांतों में एक सिद्धांत उल्लेखनीय है, जो कहता है कि उस देश में जो मुस्लिम शासन में नहीं है जब भी कभी मुसलमानों के कानून और उस देश के विद्यमान कानून के बीच विवाद उत्पन्न हो, तो इस्लामिक कानून को उस देश के कानून के ऊपर माना जाएगा। मुसलमानों के लिए मुस्लिम कानून का अनुपालन और उस देश के कानून की अवहेलना उचित माना जाएगा।”
- पृष्ठ क्रमांक 350 पर अंबेडकर लिखते है की “मुस्लिम मज़हबी सिद्धांतों के अनुसार, विश्व दो हिस्सों में विभाजित है दार-उल-इस्लाम तथा दार-उल-हर्ब। मुस्लिम शासित देश दार-उल-इस्लाम है। वह देश जहाँ मुस्लिम सिर्फ रहते ही ना की उस पर शासन करते हैं दार-उल-हर्ब है। मुस्लिम धार्मिक कानून का ऐसा होना के कारण भारत हिंदुओं तथा मुसलमानों दोनों की मातृभूमि नहीं हो सकती है। इस समय यह देश गैर-मुस्लिम सत्ता के अधिकार के अंतर्गत है, इसलिए मुसलमानों की धरती नहीं हो सकती। यह देश दार-उल-इस्लाम होने की बजाय दार-उल-हर्ब बन जाता है।”
- पृष्ठ क्रमांक 351 पर अंबेडकर लिखते है की “यह उल्लेखनीय है कि जो मुसलमान अपने आप को दार-उल-हर्ब में पाते हैं, उनके बचाव के लिए हिजरत (उस जगह को छोड़ना) ही उपाय नहीं है। मुस्लिम मज़हबी कानून की दूसरी आज्ञा जिहाद है, जिसके तहत हर मुसलमान शासक का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह इस्लाम के शासन का तब तक विस्तार करता रहे, जब तक सारी दुनिया मुसलमानों के नियंत्रण में नहीं आ जाती। संसार के दो खेमों में बंटने की वजह से सारे देश या तो दार-उल-इस्लाम (इस्लाम का घर) या दार-उल-हर्ब (युद्ध का घर) की श्रेणी में आते हैं। तकनीकी तौर पर हर मुस्लिम शासक का, जो इसके लिए सक्षम है, कर्तव्य है कि वह दार-उल-हर्ब को दार-उल-इस्लाम में बदल दे”।
- पृष्ठ क्रमांक 352 पर अंबेडकर लिखते है की “मुसलमान जिहाद की घोषणा ही नहीं कर सकते, बल्कि उसकी सफलता के लिए विदेशी मुस्लिम शक्ति की मदद भी ले सकते हैं, और यदि विदेशी मुस्लिम शक्ति जिहाद की घोषणा करना चाहती है तो उसकी सफलता के लिए सहायता दे सकते हैं।”
- पृष्ठ क्रमांक 359 पर डॉ अंबेडकर लिखते है की “खिलाफत आंदोलन के दौरान जब मुसलमानों की मदद के लिए हिंदू काफ़ी कुछ कर रहे थे, तब भी मुसलमान यह नहीं भूले थे कि उनकी तुलना में हिंदू निम्न और घटिया कौम है।”
- पृष्ठ क्रमांक 361 पर डॉ अंबेडकर लिखते है की “अलीगढ़ और अजमेर में बोलते हुए मुहम्मद अली ने कहा : “गांधी का चरित्र कितना भी पवित्र क्यों न हो, मज़हबी दृष्टिकोण से वह मुझे किसी भी मुसलमान से निकृष्ट ही लगेंगे, चाहे वह मुसलमान कितना भी चरित्रहीन क्यों न हो।”
जब श्री मुहम्मद अली लखनऊ के अमीनाबाद पार्क की सभा में बोल रहे थे, तब उनसे पूछा गया कि क्या उनके द्वारा दिया गया उपर्युक्त कथन सत्य है, तो उन्होंने बिना किसी झिझक या पश्चाताप के कहा :
“हाँ, मेरी मज़हबी मान्यता के अनुसार, मैं एक व्यभिचारी और गिरे हुए मुसलमान को भी श्री गांधी से श्रेष्ठ मानता हूँ।”
- पृष्ठ क्रमांक 291 पर डॉ अंबेडकर लिखते है की “एक सतही पर्यवेक्षक भी यह समझने में चूक नहीं करेगा कि मुसलमानों के प्रति हिन्दुओं और हिन्दुओं के प्रति मुसलमानों का आक्रामक रवैया ही उनके दृष्टिकोण को व्यक्त करता है। हिन्दुओं का आक्रामक रवैया हाल ही में होना शुरू हुआ है। मुसलमानों का आक्रामक रवैया उनका जातीय चरित्र है। ऐसा नही है कि यदि अवसर दिया जाए तो हिन्दू गति पकड़ लेंगें और मुसलमानों को पीछे नहीं छोड़ देंगे। परन्तु वर्तमान में तो इस आक्रामक मनोभाव के प्रदर्शन से मुसलमान ही हिन्दुओं को बहुत पीछे छोड़ चुके हैं।”
- पृष्ठ क्रमांक 291 – “मुसलमानों की राजनीतिक आक्रामकता के बारे में संक्षेप में कुछ चर्चा करना आवश्यक है। क्योंकि उनके राजनीतिक आक्रमणों ने जो विकार उत्पन्न कर दिए हैं, उन्हें नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता। मुसलमानों की इस राजनीतिक आक्रामकता की तीन बातें ध्यान देने योग्य हैं।
पहली बात यह है कि मुसलमानों की राजनीतिक माँगें हनुमानजी की पूँछ की तरह बढ़ती जा रही हैं। उनकी माँगों का समारम्भ 1892 से होता है।”
“ध्यान देने वाली दूसरी बात हिन्दुओं की कमजोरियों से लाभ उठाने की मुसलमानों की भावना है। हिन्दू यदि कहीं विरोध करते हैं, तब पहले तो मुसलमान अपनी बात पर अड़ते हैं और उसके बाद हिन्दू जब मुसलमानों को कुछ दूसरी रियायतें देकर मूल्य चुकाने के लिए तैयार होते हैं तब मुसलमान जिद छोड़ते हैं।”
“तीसरी बात, मुसलमानों द्वारा राजनीति में अपराधियों के तौर-तरीके अपनाया जाना है। दंगे इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि गुंडागर्दी उनकी राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है।”
डॉ अंबेडकर द्वारा लिखित आततायी मुस्लिम हमलावरों की सूची [पृष्ठ 63]
711 A.D.: Mahommad bin Qasim (son of Qasim) invaded Sind.
1001 A.D.: Muhammad of Ghazni invaded India.
1173 A.D.: Mahommad Ghori invaded India (and reoccupied Sind).
1221 A.D.: Chenghiz Khan arrived at the border of India and later marched on and sacked Lahore.
1398 A.D.: Taimur invaded India.
1526 A.D.: Babar invaded India.
1738 A.D.: Nadirshah swept over the Punjab.
1761 A.D.: Ahmadshah Abdalli invaded India and fought at Panipat.
डॉ अंबेडकर के विचार – काँग्रेस पर :-
- पृष्ठ क्रमांक 35 – “महात्मा गांधी की प्रेरणा से काँग्रेस ने भाषाई राज्यों के सिद्धांत को लागू किया। भारत को 20 प्रांतों मे भाषा के आधार पर बाटा गया और इस बात पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया की प्रशासनिक इकाई सभ्य जीवन जीने का न्युनतम स्तर उपलब्द कराने या जुटाने मे समर्थ होगी या नहीं।”
- पृष्ठ क्रमांक 58 – “कॉंग्रेस किसी समुदाय के किसी ऐसे सदस्य के साथ सत्ता मे हिस्सेदारी को तैयार नहीं है जो काँग्रेस के प्रति निष्ठावान ना हो। काँग्रेस के प्रति निष्ठा सत्ता मे भागीदारी की पहली शर्त है।”
- पृष्ठ क्रमांक 317 – “कांग्रेसी हिन्दू राष्ट्रवादी हैं जिनकी नीति मुसलमानों के प्रति राजनीतिक सहिष्णुता और तुष्टीकरण करने की रहती है। चूँकि वे यह विश्वास करते थे कि स्वतंत्रता प्राप्त करने का लक्ष्य उनके समर्थन के बिना नहीं प्राप्त किया जा सकता।”
- पृष्ठ क्रमांक 317 पर डॉ अंबेडकर लिखते है की “मुझे लगता है कि दो बातों को समझने में कांग्रेस से चूक हुई है। पहली बात जिसे कांग्रेस समझ नहीं सकी वह यह है कि तुष्टीकरण और समझौते में फर्क होता है, और यह फर्क बुनियादी किस्म का होता है। तुष्टीकरण का अर्थ होता है, आक्रमणकारी के द्वारा किए गये आग, लूट, बलात्कार और हत्या से प्रभावित हुए निर्दोष लोगों पर किए गए अत्याचारों की अनदेखी करके, अपराधियों को समझौते के मार्ग पर लाना, जबकि समझौते का अर्थ होता है लक्ष्मण रेखा का निर्धारण करना, जिसका दोनों में से कोई भी पक्ष उल्लंघन नहीं कर सकता। तुष्टीकरण से आक्रमणकारी की महत्वाकांक्षाओं और मांगों पर अंकुश नहीं लगता है। किन्तु समझौता अंकुश लगाता है।”
- पृष्ठ क्रमांक 318 पर डॉ अंबेडकर लिखते है की “दूसरी बात जिसे कांग्रेस समझने में असमर्थ रही है वह यह है कि छूट देने की उसकी नीति के कारण मुस्लिम आक्रामकता में वृद्धि हुई है तथा जो बात इससे भी बुरी हुई है वह यह है कि मुसलमान इसे हिन्दुओं के पराजय-भाव का एक चिह्न मानते हैं।”
